पी. रामना राव



मनेन्द्रगढ़। खैर माता मंदिर वार्ड क्रमांक 02 निवासी पी. रामना राव (58 वर्ष), पिता पी. जगन्नाथ राव, उन गुमनाम कर्मियों में से हैं जिनके कंधों पर कई संस्थान चलते हैं, लेकिन जिनकी पीड़ा कभी बाहर नहीं आ पाती। उन्होंने अपने जीवन के अनमोल 28 वर्ष रेलवे इंस्टिट्यूट को समर्पित कर दिए, पर बदले में आज भी उन्हें मात्र 2000 रुपये मासिक मानदेय पर संतोष करने को मजबूर होना पड़ रहा है।

14 अगस्त 1967 को जन्मे पी. रामना राव ने 21 सितंबर 1997 को रेलवे इंस्टिट्यूट में चौकीदार के रूप में सेवा प्रारंभ की थी। तब उन्हें केवल 450 रुपये मासिक वेतन मिलता था। उस समय तत्कालीन स्टेशन मास्टर डी. गाँगोली द्वारा कार्य की शुरुवात करवाई गई थी। उम्मीद थी कि वर्षों की ईमानदार सेवा उन्हें सम्मान और सुरक्षित भविष्य देगी, लेकिन यह उम्मीद समय के साथ टूटती चली गई।
वर्ष 2000 में मेंस यूनियन के हस्तक्षेप से वेतन में 500 रुपये की वृद्धि हुई। 2002 में फिर 500 रुपये बढ़े और वेतन 1500 रुपये पहुंचा। 2005 में अंतिम बार 500 रुपये जोड़कर मानदेय 2000 रुपये किया गया। इसके बाद करीब दो दशक बीत गए, लेकिन उनकी तनख्वाह वहीं की वहीं ठहरी रह गई। महंगाई बढ़ती रही, जिम्मेदारियां बढ़ती रहीं, लेकिन व्यवस्था का दिल नहीं पसीजा।


पी. रामना राव केवल चौकीदार नहीं हैं। वे रेलवे इंस्टिट्यूट की साफ-सफाई, रख-रखाव और रेलवे स्कूल की देखरेख की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। पोलियो अभियान, चुनाव ड्यूटी, वार्षिक खेलकूद, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस का ध्वजारोहण हो या कोविड टीकाकरण जैसे कठिन दौर — हर जिम्मेदारी उन्होंने बिना किसी शिकायत के निभाई।
उनके परिवार में धर्मपत्नी पी. कल्याणी, बड़े पुत्र पी. परमेश्वर राव (24 वर्ष) और छोटे पुत्र पी. संमुख राव (18 वर्ष) हैं। 2000 रुपये की आय में परिवार का भरण-पोषण करना, बच्चों के भविष्य के सपने देखना और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना उनके लिए एक निरंतर संघर्ष है।
28 वर्षों की ईमानदार सेवा के बाद भी सम्मानजनक वेतन से वंचित यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जो सेवा लेती है, पर संवेदना भूल जाती है।

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