मनेन्द्रगढ़ /एम सी बी
“गौरैया… वह नन्हीं सी चिड़िया जो कभी हमारे घर के आंगन, रोशनदान और बरामदों की शान हुआ करती थी, आज आधुनिकता की दौड़ और कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गई है।” यह बात हम अक्सर चर्चाओं में सुनते हैं, लेकिन इस लुप्त होती चहचहाहट को वापस लाने के लिए प्रकृति प्रेमी प्रिया विश्वकर्मा ने एक मज़बूत बीड़ा उठाया है


वन विभाग के साथ संयुक्त प्रयास करते हुए प्रिया विश्वकर्मा गौरैया चिड़िया के संरक्षण और संवर्धन के लिए ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रही हैं। उनका यह जुनून आज कई घरों के सूने पड़े आंगनों में नई उम्मीद जगा रहा है


300 आशियाने तैयार, 1000 का लक्ष्य
प्रियंका का मानना है कि गौरैया को बचाने के लिए केवल बातें नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित आशियाना देना ज़रूरी है। इसी उद्देश्य के साथ वे जगह-जगह कृत्रिम घोंसले लगवा रही हैं। अब तक वे 300 घोंसले लगा चुकी हैं और उन्होंने 1000 घोंसले लगाने का विशाल लक्ष्य निर्धारित किया है। उनकी इस मुहिम का असर यह है कि अब आम जनमानस भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने घरों में घोंसले लगवा रहे हैं।


पशु-पक्षियों की मूक भाषा को समझने की अपील
प्रिया केवल गौरैया ही नहीं, बल्कि बेजुबान पशुओं के लिए भी उतनी ही संवेदनशील हैं। वे गौ माता और अन्य जानवरों के लिए जगह-जगह पानी की व्यवस्था कर रही हैं।

उन्होंने समाज से भावुक अपील करते हुए कहा:
“हमारे आसपास के पशु-पक्षी हमसे बहुत कुछ कहते हैं, बस हमें उन्हें सुनने की ज़रूरत है। उन्हें भूख लगती है, प्यास लगती है और धूप से बचने के लिए एक सुरक्षित ठिकाने की तलाश रहती है। आइए, हम सब मिलकर उनके लिए दाना-पानी और आशियाने की व्यवस्था करें।”


बुजुर्गों के संस्कार और सनातनी परंपरा का निर्वहन
प्रिया बताती हैं कि पशु-पक्षी प्रेम उन्हें विरासत में मिला है। हमारे बुजुर्गों ने हमेशा सिखाया है कि ‘पहली रोटी गाय की’ और ‘पक्षियों को दाना-पानी’ देना पुण्य का काम है। वे इसी पारिवारिक संस्कार को आगे बढ़ा रही हैं।


प्रकृति प्रेमियों के लिए बनीं प्रेरणा
प्रिया के इस भगीरथ प्रयास से प्रेरित होकर शहर के कई लोग इस सेवा कार्य से जुड़ रहे हैं। लोग स्वयं आगे आकर घोंसले ले जा रहे हैं ताकि उनके घर भी फिर से चहचहाहट से गूंज उठें।


प्रिया का यह अटूट विश्वास है कि यदि हम सब मिलकर प्रयास करें, तो वह दिन दूर नहीं जब गौरैया फिर से हमारे आँगन में फुदकती नजर आएगी और प्रकृति का संतुलन फिर से बहाल होगा। उनका यह कार्य न केवल पर्यावरण के लिए आवश्यक है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है।

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