मुख्य बातें (Highlights at a Glance)


ईपीएफ वेतन सीमा हटाने की मांग: हिंद मजदूर सभा (HMS) पूरे वेतन को प्रोविडेंट फंड (EPF) के दायरे में लाने और वेतन सीमा समाप्त करने के लिए निरंतर संघर्षरत है।
ठेकेदारी मजदूरों को राहत: उच्च वेतन पाने के बावजूद ₹15,000/- तक सीमित ईपीएफ कटने की विसंगति दूर होने से नियोक्ताओं (मालिकों) को मिलने वाले अनुचित लाभ पर रोक लगेगी।


कोयला और अन्य क्षेत्रों में सुधार: कोयला उद्योग के स्थाई कर्मचारियों की तर्ज पर ठेकेदारी मजदूरों के वेतन और पेंशन विसंगतियों को दूर करने की मांग तेज कर दी गई है।
प्रमुख मांगें: ₹26,000 न्यूनतम मासिक वेतन (कम से कम ₹1,000 प्रतिदिन), बंद पड़ी इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस (ILC) को फिर से शुरू करना और नेशनल कोल वेज एग्रीमेंट-12 की दिशा में कदम बढ़ाना।


मनेन्द्रगढ़/एम सी बी
एम्पलाइज प्रोविडेंट फंड (EPF) के सदस्यों, विशेष रूप से ठेकेदारी मजदूरों को जल्द ही एक बड़ा और ऐतिहासिक फायदा मिलने की उम्मीद है। हिंद मजदूर सभा (HMS) के राष्ट्रीय महासचिव एवं ईपीएफ के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य हरभजन सिंह सिद्धू के नेतृत्व में एक लंबी और संघर्षपूर्ण लड़ाई के बाद यह सफलता सामने आ रही है। हिंद मजदूर सभा पूरे वेतन को प्रोविडेंट फंड के दायरे में लाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


कोयला और ठेकेदारी मजदूरों की स्थिति में अंतर


कोयला उद्योग के विभागीय स्थाई कर्मचारी कोल माइन्स प्रोविडेंट फंड (CMPF) के अधीन आते हैं, जिनका वर्तमान मूल वेतन कम से कम ₹39,069.24/- या उससे अधिक है और उनकी पेंशन 7% अलग से कटती है। हिंद खदान मजदूर फेडरेशन के असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी अख्तर जावेद उस्मानी के अनुसार, फेडरेशन कोयला मजदूरों के पेंशन रिवीजन की लड़ाई मजबूती से लड़ रहा है।


इसके विपरीत, ठेकेदारी मजदूरों का ईपीएफ अब तक केवल ₹15,000/- तक ही काटा जाता रहा है, जबकि हाई पावर कमेटी की सिफारिशों के अनुसार उनका वेतन कम से कम ₹34,346/- (26 दिन के लिए ₹1,321 प्रतिदिन) से लेकर उच्च दक्षता वाले कार्यों के लिए ₹36,920/- (₹1,420 प्रतिदिन) तक होना चाहिए। हालांकि, यह अभी भी कागजों और लेबर पेमेंट सर्टिफिकेट्स तक ही सीमित है।
नियोक्ताओं (मालिकों) का फायदा और मजदूरों का नुकसान


चार नए लेबर कोड्स में अलग-अलग मूल वेतन (₹18,000 से ₹24,000 तक) को मजदूर की श्रेणी में रखा गया है। इसके बावजूद, ईपीएफ का लाभ मजदूरों को ₹15,000/- पर ही मिलता था, जिसमें मालिक के 12% हिस्से में से 8.33% पेंशन में जाता है। इससे मजदूरों को पीएफ और पेंशन दोनों मोर्चों पर कम लाभ मिलता है, जबकि यदि मालिक किसी कर्मचारी को एक लाख रुपये भी वेतन देता है, तो भी वह ईपीएफ का अपना हिस्सा ₹15,000/- तक ही सीमित रखता था। इस व्यवस्था से मालिकों को भारी वित्तीय लाभ मिलता रहा है, जिसे अब बदलने की तैयारी है।


राज्यवार न्यूनतम वेतन की विसंगतियां
विभिन्न राज्यों में न्यूनतम वेतन की स्थिति अभी भी असमान है:
छत्तीसगढ़: न्यूनतम वेतन ₹11,402/- से ₹13,612/- तक तय किया गया है, जिसे विभिन्न जोन (ए, बी, सी) में बांटा गया है।
मध्य प्रदेश: न्यूनतम वेतन ₹12,425/- से लेकर उच्च दक्षता वाले कार्यों हेतु ₹16,769/- (30 सितंबर 2026 तक प्रभावी) तय किया गया है। राहत की बात यह है कि यहां ग्रामीण और शहरी इलाकों के न्यूनतम वेतन में कोई फर्क नहीं रखा गया है।


हिंद मजदूर सभा की प्रमुख मांगें और भविष्य की दिशा
हिंद मजदूर सभा लगातार यह मांग करती रही है कि न्यूनतम वेतन ₹26,000/- (कम से कम ₹1,000 प्रतिदिन) किया जाए, ईपीएफ की वेतन सीमा समाप्त की जाए और इसे सीएमपीएफ की तर्ज पर लागू किया जाए।


अख्तर जावेद उस्मानी ने विश्वास जताया है कि एचएमएस के सतत संघर्ष के परिणाम स्वरूप पिछले 10 वर्षों से बंद पड़ी इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस (ILC) की बैठकें फिर से शुरू होंगी। इससे न्यूनतम मजदूरी की विसंगतियों, ईपीएफ और ग्रेच्युटी सीलिंग की समाप्ति, तथा वर्तमान में ₹178 प्रतिदिन पर अटके नेशनल फ्लोर लेवल वेजेस के रिवीजन पर ठोस निर्णय लिया जा सकेगा।


यूनियन ने सभी से आह्वान किया है कि इस संघर्ष में समर्थन दें ताकि मजदूरों के पसीने का सम्मानजनक मूल्यांकन हो सके और शीघ्र ही नेशनल कोल वेज एग्रीमेंट-12 (NCWA-12) की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।

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